Sunday, June 10, 2012

कदमो-निशां खामोश हैं....

कहाँ से चले थे, किधर जा रहे हैं..
किस बात का रोष है,
जो खो गया क्या वही कल का  जोश है?
क्यों सो गयी है सोच?
क्यों पुत गयी है अमावस की कालिख इस पर ?
सूखी रेत को कीचड़ का ढेर समझते थे
आज कदमो-निशां खामोश हैं....

Sunday, June 3, 2012

where art thou..my wandering words?


how i burn and how i earn,
in poetic realms.
oh words! i look for you in my abraded dreams,
for you it is I speak in this hour...

my mind soars o'er landless oceans,
though sunken with agoraphobic delusions.
how have you forsaken me?
for all I know is; my pen's drunken levity

how angry are you? and why is this wish,
you thrust upon me,that hurts you and dares you...
let me rest on your trembling shoulders oh words!
for you have raided my frivolity

how my monologue strays with your emptiness,
and how i sulk in this wordless mire,
under me and over me lies your dreamy sonnet,
but with me, just a decadent soliloquy..

come to me oh words!, for the moon has all but set
the sun will bring new sorrows,
as I'll sleep through its mundane obscurity
waiting for another night, that of a soldier's delight,
and of a poet's might......

Wednesday, May 30, 2012

फ़िक्र छोड़ बस चढ़ जाता मैं...

कम्पन करती श्वास मेरी,
जब टकराती आइने से,
"हिमगिरी बुलाये तुझको "-धुंधली मेरी प्रतिमा कहती ,
बढ़ जा इक मनमाने से |

मिल जाते कुछ राहगीर इस पथ पर ,
कुछ जाने कुछ अनजाने से,
कूकती कोयल भी कह जाती ,
चल पड़े परवाने लेकर हथेली पर अफसाने से |

गिरि के दृष्य को देख ठिठक जाता मैं ,
समय भी तो सो जाता इसके आने से,
पर इस चंचल मन को कौन सुलाता,
उस चोटी के पैमाने को पा जाने से |

वह चोटी अब बुलाती मुझको,
शीत पवन के गाने से,
फ़िक्र छोड़ बस चढ़ जाता मैं,
अंत विहीन हो जाने से |

Tuesday, May 29, 2012

बंद करो ये नेतागिरी...

इस कृत्रिम समाज में आगे चलने वालों,
झूठी राह दिखाने वालों,
किसे लेकर कहाँ जाओगे,
यहीं पैदा हुए थे, इसी मिट्टी में मिल जाओगे |

झूठ को सच और सच को अधीन  बताओगे ?
जल्लादों  को भगवान और भगवान को लुप्त दिखाओगे ?
चंचल मन है, ये अर्धसत्य का पुजारी है,
किसी को मित्र तो किसी को शत्रु मानता है,
कह गए संत कवी ; इसके साथ खिलवाड़ करोगे
तो जीवन का अपकार करोगे |

छोड़ो इस झूठे आध्यात्म  को,
आओ बैठो साथ, बात करो ,
कुछ व्यंग्य कुछ विचार करो,
जीवन एक दर्पण है, इसकी गहराई को समझो,
खुल जायेंगे राज़, धुल जायेंगे घाव |

इस शुष्क होती पवन का ,
आर्द्रता से सत्कार करो | 

मेरे स्वप्न ही तो हैं..

गश्त लगाते ये स्वप्न ,
आँखों के झिलमिल सितारे हैं |
चाहता हूँ, शामिल कर लूं इन्हें
जागते पिरो लूं इन्हें , पर
खुली आँखों पर चादर कौन डाले,
ये तो अंधेरों में टिमटिमाते उजाले हैं |

काफ़िर हो भटक भी जायें ,
पथिक के कदम लहक भी जायें,
मत कहना, राह न दिखाना,
याद है? जरासंध ने श्रीकृष्ण को हराया था..
फिर क्यों गीता का ऋण उठाते हो?
छोड़ो अब, मेरे स्वप्नों में क्या पाओगे,
साथ रहे तो तुम भी जीना सीख जाओगे |

हे ईश्वर कहाँ हो ?

वो सोचता होगा ,
ईश्वर की कल्पना करता होगा |

दिलो-दिमाग को टटोलता होगा,
उठते बैठते सोते जागते ,हाले बयाँ करता होगा
क्या है यौवन की क्रीड़ा और बुढ़ापे की पीड़ा,
सोचता होगा,
ईश्वर की कल्पना करता होगा |

पग-पग के कंकड़ पर  जीवन का अर्थ ढूंढता होगा,
मृत्यु के पश्च्यात क्या है,जन्म के पूर्व क्या था,
सृष्टि का अंत क्या है और उद्धार क्या,
सोचता होगा,
ईश्वर की कल्पना करता होगा |

समंदर की उफनती लहरों के समान साहिल से टकराता होगा,
मृत चट्टानों में अपनी छवि ढूंढता होगा,
बढ़ी धडकनों को दबाता और दबी धडकनों को बढ़ाता होगा,
सोचता होगा,
ईश्वर की कल्पना करता होगा |

मैं हूँ...

मैं पित्र दुलार का शेष हूँ,
बहती धारा का क्लेश हूँ,
खुली आँखों से स्वप्निल हो जाऊं ,
ऐसा भी हो सकता है|

मैं रात की रानी का राजा हूँ,
मदमस्त चांदनी का दरवाज़ा हूँ,
पल में मोहित, पल लोभित हो जाऊं,
ऐसा भी हो सकता है|

मैं पवन रुपी समय का सारथी हूँ,
गिरता-संभलता, ओझल रहता विद्यार्थी हूँ,
मेरे पास आये तो दूर जाओगे, दूर जाकर याद करोगे,
ऐसा भी हो सकता है|

कह गए कुछ मित्र हमारे ,
"तुम गायक अच्छे हो, दिल के बड़े सच्चे हो,
सावधान रहना दुनिया बड़ी कठोर है,
कभी शांति तो कभी शोर है"
मैं हंस कर बात बदल दूं,
ऐसा भी हो सकता है|

फिर जीवन चाहे जैसे चले,
कुछ भी मेरा बाध्य न होगा,
भ्रम को भ्रमित, तथा लालसा को लालायित करता रहूँगा,
रमता रहूँगा, पलता रहूँगा, चलता रहूँगा....... 

एक जाम ....

कभी खुद को देखते हैं,
कभी धुंधलाती अपनी परछाई को,
नज़रें अगर झुक जायें
तो एक जाम भर लेते हैं |

तन्हाई को गले लगाते हैं, ख़ुशी का मातम मनाते हैं,
दीवारों में दिल और अखबारों में कान लगाते हैं |
सच और झूठ की इस फुलवारी से जब दिल भर जाये,
 तो एक जाम भर लेते हैं|

व्यर्थ जाती समय की वह लहर याद आती है
जब नशे की आड़ में लिखते थे कविता ,
और खुद को समझते थे ग़ालिब का पोता ,
आज भी जब कलम उठाते हैं, तो एक जाम भर लेते हैं |

रोको मत मुझे , चले जाने दो इन नशे की गहराईयों में,
बदनसीब तो वो हैं, जो अकेले पीते हैं,
लेकिन जब साकि ही साथी बन जाये,
तो एक जाम भर लेते हैं|

Tuesday, February 28, 2012

smokey smokerson.....

a calm soul,
a wretched body,
obscure thoughts and a benign reality,
heavy feet, transition lost...
transition done
to a secure paradigm of uncertainty.

till i take a trip through the cranky
outside radiance,
let a mental division be made;
let one part go sway
and the other put.
with much ado when the wanderer returns,
evolution has completed the circle...