Wednesday, May 30, 2012

फ़िक्र छोड़ बस चढ़ जाता मैं...

कम्पन करती श्वास मेरी,
जब टकराती आइने से,
"हिमगिरी बुलाये तुझको "-धुंधली मेरी प्रतिमा कहती ,
बढ़ जा इक मनमाने से |

मिल जाते कुछ राहगीर इस पथ पर ,
कुछ जाने कुछ अनजाने से,
कूकती कोयल भी कह जाती ,
चल पड़े परवाने लेकर हथेली पर अफसाने से |

गिरि के दृष्य को देख ठिठक जाता मैं ,
समय भी तो सो जाता इसके आने से,
पर इस चंचल मन को कौन सुलाता,
उस चोटी के पैमाने को पा जाने से |

वह चोटी अब बुलाती मुझको,
शीत पवन के गाने से,
फ़िक्र छोड़ बस चढ़ जाता मैं,
अंत विहीन हो जाने से |

No comments:

Post a Comment