Tuesday, May 29, 2012

एक जाम ....

कभी खुद को देखते हैं,
कभी धुंधलाती अपनी परछाई को,
नज़रें अगर झुक जायें
तो एक जाम भर लेते हैं |

तन्हाई को गले लगाते हैं, ख़ुशी का मातम मनाते हैं,
दीवारों में दिल और अखबारों में कान लगाते हैं |
सच और झूठ की इस फुलवारी से जब दिल भर जाये,
 तो एक जाम भर लेते हैं|

व्यर्थ जाती समय की वह लहर याद आती है
जब नशे की आड़ में लिखते थे कविता ,
और खुद को समझते थे ग़ालिब का पोता ,
आज भी जब कलम उठाते हैं, तो एक जाम भर लेते हैं |

रोको मत मुझे , चले जाने दो इन नशे की गहराईयों में,
बदनसीब तो वो हैं, जो अकेले पीते हैं,
लेकिन जब साकि ही साथी बन जाये,
तो एक जाम भर लेते हैं|

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