Tuesday, May 29, 2012

मैं हूँ...

मैं पित्र दुलार का शेष हूँ,
बहती धारा का क्लेश हूँ,
खुली आँखों से स्वप्निल हो जाऊं ,
ऐसा भी हो सकता है|

मैं रात की रानी का राजा हूँ,
मदमस्त चांदनी का दरवाज़ा हूँ,
पल में मोहित, पल लोभित हो जाऊं,
ऐसा भी हो सकता है|

मैं पवन रुपी समय का सारथी हूँ,
गिरता-संभलता, ओझल रहता विद्यार्थी हूँ,
मेरे पास आये तो दूर जाओगे, दूर जाकर याद करोगे,
ऐसा भी हो सकता है|

कह गए कुछ मित्र हमारे ,
"तुम गायक अच्छे हो, दिल के बड़े सच्चे हो,
सावधान रहना दुनिया बड़ी कठोर है,
कभी शांति तो कभी शोर है"
मैं हंस कर बात बदल दूं,
ऐसा भी हो सकता है|

फिर जीवन चाहे जैसे चले,
कुछ भी मेरा बाध्य न होगा,
भ्रम को भ्रमित, तथा लालसा को लालायित करता रहूँगा,
रमता रहूँगा, पलता रहूँगा, चलता रहूँगा....... 

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