इस कृत्रिम समाज में आगे चलने वालों,
झूठी राह दिखाने वालों,
किसे लेकर कहाँ जाओगे,
यहीं पैदा हुए थे, इसी मिट्टी में मिल जाओगे |
झूठ को सच और सच को अधीन बताओगे ?
जल्लादों को भगवान और भगवान को लुप्त दिखाओगे ?
चंचल मन है, ये अर्धसत्य का पुजारी है,
किसी को मित्र तो किसी को शत्रु मानता है,
कह गए संत कवी ; इसके साथ खिलवाड़ करोगे
तो जीवन का अपकार करोगे |
छोड़ो इस झूठे आध्यात्म को,
आओ बैठो साथ, बात करो ,
कुछ व्यंग्य कुछ विचार करो,
जीवन एक दर्पण है, इसकी गहराई को समझो,
खुल जायेंगे राज़, धुल जायेंगे घाव |
इस शुष्क होती पवन का ,
आर्द्रता से सत्कार करो |
झूठी राह दिखाने वालों,
किसे लेकर कहाँ जाओगे,
यहीं पैदा हुए थे, इसी मिट्टी में मिल जाओगे |
झूठ को सच और सच को अधीन बताओगे ?
जल्लादों को भगवान और भगवान को लुप्त दिखाओगे ?
चंचल मन है, ये अर्धसत्य का पुजारी है,
किसी को मित्र तो किसी को शत्रु मानता है,
कह गए संत कवी ; इसके साथ खिलवाड़ करोगे
तो जीवन का अपकार करोगे |
छोड़ो इस झूठे आध्यात्म को,
आओ बैठो साथ, बात करो ,
कुछ व्यंग्य कुछ विचार करो,
जीवन एक दर्पण है, इसकी गहराई को समझो,
खुल जायेंगे राज़, धुल जायेंगे घाव |
इस शुष्क होती पवन का ,
आर्द्रता से सत्कार करो |
No comments:
Post a Comment