Tuesday, May 29, 2012

बंद करो ये नेतागिरी...

इस कृत्रिम समाज में आगे चलने वालों,
झूठी राह दिखाने वालों,
किसे लेकर कहाँ जाओगे,
यहीं पैदा हुए थे, इसी मिट्टी में मिल जाओगे |

झूठ को सच और सच को अधीन  बताओगे ?
जल्लादों  को भगवान और भगवान को लुप्त दिखाओगे ?
चंचल मन है, ये अर्धसत्य का पुजारी है,
किसी को मित्र तो किसी को शत्रु मानता है,
कह गए संत कवी ; इसके साथ खिलवाड़ करोगे
तो जीवन का अपकार करोगे |

छोड़ो इस झूठे आध्यात्म  को,
आओ बैठो साथ, बात करो ,
कुछ व्यंग्य कुछ विचार करो,
जीवन एक दर्पण है, इसकी गहराई को समझो,
खुल जायेंगे राज़, धुल जायेंगे घाव |

इस शुष्क होती पवन का ,
आर्द्रता से सत्कार करो | 

No comments:

Post a Comment