Tuesday, May 29, 2012

मेरे स्वप्न ही तो हैं..

गश्त लगाते ये स्वप्न ,
आँखों के झिलमिल सितारे हैं |
चाहता हूँ, शामिल कर लूं इन्हें
जागते पिरो लूं इन्हें , पर
खुली आँखों पर चादर कौन डाले,
ये तो अंधेरों में टिमटिमाते उजाले हैं |

काफ़िर हो भटक भी जायें ,
पथिक के कदम लहक भी जायें,
मत कहना, राह न दिखाना,
याद है? जरासंध ने श्रीकृष्ण को हराया था..
फिर क्यों गीता का ऋण उठाते हो?
छोड़ो अब, मेरे स्वप्नों में क्या पाओगे,
साथ रहे तो तुम भी जीना सीख जाओगे |

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